ग्रहों में जज हैं शनि : शनि की पनोथी में व्यक्ति के अच्छे कर्म उसे करोड़पति बना सकते हैं

ग्रहों में जज हैं शनि : शनि की पनोथी में व्यक्ति के अच्छे कर्म उसे करोड़पति बना सकते हैं,जबकि बुरे कर्म उसे सड़कों पर ले जा सकते हैं।
  
Astrology

Astrology

सम्पत्सु महत्तम चित्तम भवेदुतपल्कोमालम I आपत्सु चा महाशैलसंघटककर्शं II जब धन आता है तो मनुष्य का मन कोमल हो जाता है और विपत्ति मन को शीला के समान कठोर बना देती है और इस कठोरता का अर्थ है शनि की पीड़ा और पीड़ा।

शनि का अर्थ है एकांत-आध्यात्म। शनि का अर्थ है खतरा, दर्द, पीड़ा। शास्त्रों में शनि को पाप ग्रह माना गया है। शनि कर्म से जुड़ा ग्रह है। शनि का अर्थ है चिंतन। यदि व्यक्ति विचार नहीं करेगा तो वह जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है। बिना सोचे समझे उठाया गया कदम विनाश की ओर ले जाता है। इसलिए शनि को योजना से जुड़ा ग्रह माना जाता है। अंग्रेजी में कहा जाता है, "सैटर्न का अर्थ है विनाश के बाद प्रबंधन।" गुजराती में एक कहावत है कि 'जेवू कर्म नी पल' और हिंदी में 'जैसी करनी वैसी भरनी' जैसी कहावतें शनि पर आधारित हैं। क्योंकि शनि का सीधा संबंध कर्म से है। मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों के लिए शनि ने पनोटी नामक हौ का निर्माण किया है। हम अक्सर सुनते हैं कि पनोटी के दौरान कोई व्यक्ति या तो सड़कों पर उतर जाता है या करोड़पति बन जाता है। शनि पनोटी के दौरान कर्म उदर जमान की किताब खोलकर बैठते हैं। पनोटी के बाद मनुष्य का संतुलन संतुलित हो जाता है। अत: पनोटी के बाद मनुष्य एक पस्त बर्तन के समान हो जाता है। शनि जब अन्य ग्रहों से युति करता है तो क्या फल देता है? आइए इसकी चर्चा करें।

 

शनि-सूर्य का संबंध शास्त्रों में खराब माना गया है। क्योंकि ब्रह्मांड में शनि और सूर्य एक दूसरे के खतरनाक शत्रु माने जाते हैं। सूर्य-शनि की युति मनुष्य को उत्थान-पतन-संघर्ष देती है। भगवान रामचंद्र की कुंडली में भी शनि-सूर्य की युति थी। शनि-सूर्य संबंध अर्थात संघर्ष, शोक, कष्ट आदि। ऐसे रिश्ते वाले लोग जीवन भर मेहनत करते देखे जाते हैं। ऐसे लोगों को दिल की बीमारी, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां होती हैं। ऐसे जातकों का पिता से मेलजोल कम होता है। ब्रह्मांड में सूर्य को पिता और शनि को पुत्र माना जाता है, लेकिन यदि कुंडली में ऐसा संबंध हो तो पिता-पुत्र नहीं होता है। यदि शनि गचर के समय कुंडली में सूर्य से गोचर करे तो पिता के लिए कष्टकारी होता है। ऐसे लोगों को सोने में 4 से 5 रत्ती का माणिक अपनी अनामिका में धारण करना चाहिए। रोज सुबह सूर्य को तांबे के लोटे में जल अर्क चढ़ाएं और आदित्य स्त्रोत का पाठ करें।

 

शास्त्रों में शनि-चंद्र का संबंध संगुणी माना गया है। ऐसे जातक मानसिक रूप से कमजोर होते हैं, क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। शनि-चंद्र का संबंध नर्वस व्रैकिंग है। ऐसा संबंध जातक के मानसिक भ्रम को बढ़ाता है। दिमाग कमजोर हो जाता है। कभी-कभी खतरे ढेर हो जाते हैं। बेशक ऐसे लोग जीवन में अधिक पैसा कमाते हैं और अच्छे पद और सुख भोगते हैं, लेकिन मन से दुखी होते हैं। विष योग से पीड़ित जटा को बसरा का मोती का पेंडेंट बनवाकर धारण करना चाहिए और चंद्र बीज मंत्र का जाप करना चाहिए।

 

शनि-मंगल का सीधा संबंध शत्रुओं का भी संबंध माना जाता है। अध्ययन की दृष्टि से यह योग तकनीकी क्षेत्र के लिए अच्छा है। इसके परिणाम इंजीनियर, कंप्यूटर इंजीनियर या अन्य तकनीकी लाइन के लिए अच्छे हैं। लेकिन मंगल सामान्य ग्रह है। मंगल साहस और साहस से जुड़ा ग्रह है। अत: यदि मंगल का पराक्रम शनि के दबाव में हो तो मंगल की सहजता-उद्यम नष्ट हो जाता है। ऐसे लोग अपराध में अधिक शामिल होते हैं। ऐसे संबंध रखने वाले जातकों को रोज सुबह मंगल मंत्र का जाप करना चाहिए और अपने माथे पर रक्त चंदन लगाना चाहिए।

 

शनि-बुध का संबंध भी इंसान की बुद्धि को भटका देता है। नतीजतन, ऐसे रिश्ते वाले लोग अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। ऐसा योग बेनंबरी धंधा के लिए उपयोगी होता है। इस योग वाले जातकों को प्रात: काल हरे आम के बीजों को एक घूंट पानी के साथ निगल लेना चाहिए। शनि-बृहस्पति का संबंध व्यक्ति को अध्यात्म की ओर मोड़ता है। शनि का अर्थ है अकेलापन-पीड़ा और बृहस्पति का अर्थ है धन-कुबेर आदि। यदि शनि बृहस्पति के साथ हो तो ऐसे लोग बहुत मितव्ययी और धन खर्च करने में कंजूस होते हैं। इस प्रकार की युति वाले लोगों को पीला पुखराज धारण करना चाहिए और सुबह के समय माथे पर हल्दी का चूर्ण लगाना चाहिए।

शनि-शुक्र का संबंध चरित्र के लिए हानिकारक होता है। ऐसी युति या प्रतियुति जातक के चरित्र को ढीला कर देती है। जातक अनेक व्यसनों का शिकार होता है। शुक्र वैवाहिक जीवन का कारक ग्रह होने के कारण ऐसा योग वैवाहिक जीवन में दरार पैदा करता है। कई बार यह सेक्स लाइफ में रुकावटें भी लाता है। ऐसे जातक शनि बीज मंत्र का जाप करें और लाल धागे में 21 लौंग की माला बनाकर हर शनिवार को हनुमानजी को अर्पित करें।

जिस स्थान पर शनि-राहु का सम्बन्ध हो वह अशुभ फल देता है। इस तरह के योग को हमारे शास्त्रों में श्रापित योग, प्रेत शाप योग आदि कहा गया है। इस प्रकार के योग वाले जातक अक्सर जीवन में असफलता का अनुभव करते हैं और कई शिकायतों के साथ जीते हैं। साथ ही कुंडली में शनि जो उस स्थान का स्वामी होता है उस स्थान के फल को भी खराब कर देता है। इसलिए ऐसा योग अशुभ माना जाता है। ऐसे जातकों को बुधवार के दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। बुधवार के दिन प्रात:काल खाली पेट एक हरी मूंग निगल लें।यदि आर्थिक स्थिति अच्छी है तो शनि के प्रकोप से बचने के लिए काला घोडा+नाडा की छड़ का प्रयोग करें। उपाय व्यक्तिगत कुंडली पर आधारित होते हैं। और हाँ पाठक मित्र हमेशा याद रखें कि शनि का एक सनातन नियम है।

'जो आपके चारों ओर जाता है, वह आपके चारों ओर आता है' का अर्थ है कि आप जो देते हैं वही है और वही आपके पास वापस आने वाला है। शनि का संदेश है.... सुकर्मा करो।

Text Example

Disclaimer : इस खबर में जो भी जानकारी दी गई है उसकी पुष्टि Aapninews.in द्वारा नहीं की गई है। यह सारी जानकारी हमें सोशल और इंटरनेट मीडिया के जरिए मिली है। खबर पढ़कर कोई भी कदम उठाने से पहले अपनी तरफ से लाभ-हानि का अच्छी तरह से आंकलन कर लें और किसी भी तरह के कानून का उल्लंघन न करें। Aapninews.in पोस्ट में दिखाए गए विज्ञापनों के बारे में कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है।